विलुप्ति के कगार पर पहुंचा मालवी ऊंट, संरक्षण के लिए शुरू हुआ अभियान

भारत की दुर्लभ ऊंट नस्लों में शामिल मालवी ऊंट तेजी से विलुप्ति के खतरे का सामना कर रहा है। 2019 की पशुधन गणना के बाद इसकी संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की गई है और 27 जुलाई 2026 तक देश में इसके केवल 102 ऊंट शेष बताए गए हैं। सफेद रंग के कारण इसे ‘व्हाइट कैमेल’ भी कहा जाता है। यह भारत की नौ मान्यता प्राप्त ऊंट नस्लों में सबसे छोटी नस्लों में से एक है।

मालवी ऊंट मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र के मंदसौर, नीमच, रतलाम और ग्वालियर जिलों तथा राजस्थान के कोटा, बूंदी, झालावाड़ और बारां क्षेत्रों में पाया जाता है। यह नस्ल दूध उत्पादन के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक मादा ऊंटनी एक दुग्ध चक्र में लगभग 4 से 5 किलोग्राम दूध देती है। पहले इसका उपयोग परिवहन और भार ढोने के लिए भी किया जाता था।

विशेषज्ञों के अनुसार जिन ऊंट नस्लों में प्रजनन योग्य मादा ऊंटों की संख्या 300 से कम होती है, उन्हें संकटग्रस्त माना जाता है। इसी कारण मालवी, मेवाड़ी और मेवाती नस्लें संरक्षण की आवश्यकता वाली श्रेणी में हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केंद्र ने शुद्ध प्रजनन कार्यक्रम शुरू किया है। राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (करनाल) के सहयोग से 12 मालवी ऊंटों का चयन कर वैज्ञानिक संरक्षण और नस्ल की आनुवंशिक पहचान सुरक्षित रखने का अभियान चलाया जा रहा है।

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