इक्कीसवीं सदी में वैश्विक शक्ति-संतुलन का केंद्र तेजी से हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र की ओर स्थानांतरित हो रहा है। विश्व के लगभग 60% समुद्री व्यापार और दो-तिहाई ऊर्जा आपूर्ति इसी क्षेत्र से होकर गुजरती है। ऐसे में भारत की इंडो-पैसिफिक नीति केवल समुद्री सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक समृद्धि, रणनीतिक संतुलन, नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और क्षेत्रीय सहयोग की व्यापक अवधारणा बन चुकी है। बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य, चीन की बढ़ती आक्रामकता तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के पुनर्गठन के बीच भारत अपनी भूमिका को एक उत्तरदायी, विश्वसनीय और संतुलित शक्ति के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहा है।
भारत ने वर्ष 2018 में शांगरी-ला संवाद में पहली बार स्पष्ट रूप से अपनी इंडो-पैसिफिक दृष्टि प्रस्तुत की। भारत की नीति किसी सैन्य गठबंधन पर आधारित नहीं, बल्कि मुक्त (Free), समावेशी (Inclusive), खुले (Open) और नियम-आधारित (Rules-based) हिंद-प्रशांत क्षेत्र की अवधारणा पर आधारित है। इस नीति का मूल उद्देश्य समुद्री मार्गों की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान, संप्रभुता की रक्षा तथा सभी देशों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना है।
भारत की इस नीति का सबसे महत्वपूर्ण आधार “SAGAR” (Security and Growth for All in the Region) है, जिसकी घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2015 में की थी। इसके अंतर्गत समुद्री सुरक्षा, मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR), समुद्री संसाधनों का सतत उपयोग तथा क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा दिया जाता है। इसके साथ ही Act East Policy, Neighbourhood First, Indo-Pacific Oceans Initiative (IPOI) तथा Mission MAHASAGAR जैसी पहलें भारत की समुद्री कूटनीति को नई दिशा प्रदान करती हैं।
वर्तमान समय में भारत क्वाड (QUAD)—भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया—का सक्रिय सदस्य है। उल्लेखनीय है कि क्वाड किसी सैन्य गठबंधन के बजाय वैक्सीन सहयोग, आपदा प्रबंधन, साइबर सुरक्षा, उभरती प्रौद्योगिकी, जलवायु परिवर्तन और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग का मंच है। इसके अतिरिक्त भारत आसियान (ASEAN) की केंद्रीय भूमिका (ASEAN Centrality) का समर्थन करता है तथा हिंद महासागर रिम एसोसिएशन (IORA) और बिम्सटेक (BIMSTEC) जैसे मंचों के माध्यम से क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत कर रहा है।
हालाँकि भारत के समक्ष कई चुनौतियाँ भी हैं। दक्षिण चीन सागर में चीन का विस्तारवादी रवैया, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के माध्यम से बढ़ता रणनीतिक प्रभाव, हिंद महासागर में चीनी नौसैनिक गतिविधियाँ तथा समुद्री डकैती और साइबर सुरक्षा जैसी गैर-पारंपरिक चुनौतियाँ भारत की सुरक्षा के लिए गंभीर विषय हैं। इसके अतिरिक्त रक्षा आधुनिकीकरण, समुद्री अवसंरचना, ब्लू इकोनॉमी तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखला में प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को और सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।
आगे की राह स्पष्ट है। भारत को समुद्री अवसंरचना, नौसेना की क्षमता, द्वीपीय देशों के साथ सहयोग, डिजिटल कनेक्टिविटी तथा हरित बंदरगाह (Green Ports) के विकास पर विशेष बल देना होगा। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून विशेषकर UNCLOS, 1982 के सिद्धांतों के पालन की वकालत करते हुए भारत को बहुपक्षवाद और रणनीतिक स्वायत्तता के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।
निष्कर्षतः, भारत की इंडो-पैसिफिक नीति केवल विदेश नीति का विस्तार नहीं, बल्कि “विकसित भारत 2047” की समुद्री एवं आर्थिक दृष्टि का आधार है। यदि भारत सहयोग, कनेक्टिविटी, सुरक्षा और नियम-आधारित व्यवस्था को समान महत्व देता है, तो वह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता का प्रमुख स्तंभ बनने के साथ-साथ वैश्विक शक्ति-संतुलन में भी निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
लेखिका माला मेश्राम एक स्वतंत्र स्तंभकार हैं। लेख में व्यक्त विचार लेखिका की निजी राय है।


