उलगुलान की चेतना और जनजातीय न्याय का अधूरा सपना

मनीष चन्द्रा | भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल दिल्ली, कोलकाता या मुंबई की राजनीतिक हलचलों तक सीमित नहीं है; इसकी सबसे सशक्त गूंज उन जंगलों और पहाड़ों से भी उठी थी, जहां जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए आदिवासी समाज ने साम्राज्यवाद के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष छेड़ा। 9 जून, ‘धरती आबा’ बिरसा मुंडा के शहादत दिवस के रूप में, हमें इसी ऐतिहासिक चेतना की याद दिलाता है। यह दिन केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं, बल्कि जनजातीय अस्मिता, संवैधानिक अधिकारों और विकास मॉडल की पुनर्समीक्षा का भी क्षण है।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में छोटानागपुर क्षेत्र का आदिवासी समाज औपनिवेशिक शोषण, जमींदारी अत्याचार और सांस्कृतिक हस्तक्षेप से त्रस्त था। ब्रिटिश सरकार की वन नीतियों ने आदिवासियों को उनकी पारंपरिक भूमि और संसाधनों से वंचित कर दिया। सामूहिक भूमि स्वामित्व की ‘खुंटकट्टी व्यवस्था’ टूट रही थी, जबकि महाजन, ठेकेदार और ‘दिकू’ आर्थिक शोषण को और गहरा कर रहे थे। ऐसे दौर में बिरसा मुंडा ने जिस ‘उलगुलान’ अर्थात महान विद्रोह का नेतृत्व किया, वह केवल सत्ता-विरोधी आंदोलन नहीं था; वह सामाजिक पुनर्जागरण, सांस्कृतिक स्वाभिमान और राजनीतिक स्वराज का उद्घोष था।

बिरसा मुंडा की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने संघर्ष को केवल हथियारों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने आदिवासी समाज में फैली कुरीतियों, अंधविश्वासों और सामाजिक विभाजनों को चुनौती दी। ‘बिरसा संप्रदाय’ के माध्यम से उन्होंने नैतिक अनुशासन, एकेश्वरवाद और सामुदायिक एकता का संदेश दिया। उनका प्रसिद्ध नारा— “अबुआ दिशुम रे अबुआ राज” — दरअसल स्वशासन और आत्मनिर्णय की उस अवधारणा का प्रारंभिक स्वर था, जो आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की केंद्रीय चेतना बनी।

यद्यपि 9 जून 1900 को रांची जेल में मात्र 25 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई, किंतु उनका आंदोलन इतिहास में स्थायी परिवर्तन छोड़ गया। ब्रिटिश शासन को छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 लागू करना पड़ा, जिसने आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासियों के हाथों में जाने से रोकने का प्रयास किया। यह स्पष्ट करता है कि जनआंदोलन केवल प्रतिरोध नहीं, बल्कि नीति-निर्माण की दिशा भी तय करते हैं।

आज 21वीं सदी के भारत में बिरसा मुंडा की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। विकास परियोजनाओं, खनन और औद्योगीकरण के नाम पर आदिवासी समुदायों का विस्थापन अब भी गंभीर चुनौती बना हुआ है। संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूचियां, पेसा अधिनियम, 1996 तथा वन अधिकार अधिनियम, 2006 जैसे प्रावधान जनजातीय अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए, किंतु इनके प्रभावी क्रियान्वयन की कमी आज भी चिंता का विषय है। जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट के इस दौर में प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का बिरसा दर्शन आधुनिक विकास मॉडल के लिए एक वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत करता है।

वास्तव में, बिरसा मुंडा को याद करना केवल अतीत को स्मरण करना नहीं, बल्कि वर्तमान को दिशा देना है। यदि विकास की प्रक्रिया में जनजातीय समाज की संस्कृति, पहचान और अधिकार सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो समावेशी विकास का दावा अधूरा ही रहेगा। ‘जनजातीय गौरव दिवस’ मनाना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है कि नीतियों और प्रशासनिक व्यवस्था में आदिवासी समुदायों की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

धरती आबा की शहादत हमें यह सिखाती है कि न्याय केवल कानूनों से नहीं, बल्कि संवेदनशील शासन और समान भागीदारी से स्थापित होता है। यही उनके सपनों के भारत की सच्ची परिकल्पना है।

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