परीक्षा की सुचिता बनाए रखना जरूरी

भारत में प्रतियोगी परीक्षाएँ लाखों युवाओं के सपनों और भविष्य से जुड़ी होती हैं। किसी भी परीक्षा का उद्देश्य योग्य और प्रतिभाशाली अभ्यर्थियों का निष्पक्ष चयन करना होता है। लेकिन जब परीक्षा में नकल, प्रश्नपत्र लीक, फर्जी अभ्यर्थियों की भागीदारी या अन्य प्रकार की अनियमितताएँ सामने आती हैं, तो परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग जाता है। ऐसे में परीक्षा की सुचिता (Integrity) बनाए रखना केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक दायित्व भी है।

हाल के वर्षों में देश के विभिन्न राज्यों में कई प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने और नकल माफियाओं की सक्रियता की घटनाएँ सामने आई हैं। इन घटनाओं ने लाखों मेहनती विद्यार्थियों की उम्मीदों को झटका दिया है। जब कोई परीक्षा रद्द होती है, तो अभ्यर्थियों को मानसिक तनाव, आर्थिक नुकसान और समय की बर्बादी का सामना करना पड़ता है। इससे युवाओं का व्यवस्था पर विश्वास भी कमजोर होता है।

परीक्षा की सुचिता केवल परीक्षा केंद्र तक सीमित नहीं है। यह प्रश्नपत्र निर्माण, सुरक्षित मुद्रण, परिवहन, ऑनलाइन सुरक्षा, परीक्षा संचालन और मूल्यांकन प्रक्रिया तक फैली हुई है। तकनीक के बढ़ते उपयोग के साथ साइबर सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है। ऑनलाइन परीक्षाओं में डेटा सुरक्षा, बायोमेट्रिक सत्यापन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी जैसे उपायों को मजबूत करना समय की मांग है।

सरकारों और परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं ने इस दिशा में कई कदम उठाए हैं। कड़े कानून, डिजिटल निगरानी, सीसीटीवी कैमरे, बायोमेट्रिक सत्यापन तथा विशेष जांच दलों का गठन सकारात्मक प्रयास हैं। किंतु केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। समाज, शिक्षण संस्थानों, अभिभावकों और स्वयं विद्यार्थियों को भी ईमानदारी और नैतिकता के मूल्यों को अपनाना होगा। यदि सफलता के लिए गलत रास्तों को स्वीकार किया जाएगा, तो प्रतिभा और परिश्रम का महत्व कम हो जाएगा।

परीक्षा में नकल या धोखाधड़ी केवल नियमों का उल्लंघन नहीं है, बल्कि यह उन लाखों छात्रों के साथ अन्याय है जो कठिन परिश्रम के बल पर सफलता प्राप्त करना चाहते हैं। एक असुचित परीक्षा प्रणाली योग्य उम्मीदवारों को अवसरों से वंचित कर सकती है और प्रशासनिक एवं संस्थागत गुणवत्ता को भी प्रभावित कर सकती है। इसलिए परीक्षा की शुचिता सीधे-सीधे राष्ट्र निर्माण और सुशासन से जुड़ा विषय है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि परीक्षा प्रणाली को पूर्णतः पारदर्शी, सुरक्षित और जवाबदेह बनाया जाए। तकनीकी नवाचारों के साथ-साथ नैतिक शिक्षा और सामाजिक जागरूकता को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए। दोषियों के विरुद्ध त्वरित और कठोर कार्रवाई से ही नकल एवं पेपर लीक जैसे अपराधों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है।

अंततः, परीक्षा की सुचिता बनाए रखना केवल सरकार या परीक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। निष्पक्ष और विश्वसनीय परीक्षा प्रणाली ही प्रतिभा को उचित सम्मान दिला सकती है तथा युवाओं में व्यवस्था के प्रति विश्वास को मजबूत कर सकती है। यदि हमें एक सक्षम, ईमानदार और विकसित भारत का निर्माण करना है, तो परीक्षा की सुचिता को हर हाल में सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।

लेखिका माला मेश्राम एक स्वतंत्र स्तंभकार हैं। लेख में व्यक्त विचार लेखिका की निजी राय है।

Related Articles

- Advertisement -spot_img

Latest Articles