यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड द्वारा प्रकाशित हालिया अध्ययन ने भारत के शहरी विकास मॉडल पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। अध्ययन में बेंगलुरु, मुंबई, हैदराबाद और चेन्नई सहित 14 भारतीय शहरों को दुनिया के शीर्ष 50 उच्च ताप जोखिम (Heat Risk) वाले शहरी केंद्रों में शामिल किया गया है। यह केवल एक वैज्ञानिक रिपोर्ट नहीं, बल्कि भविष्य के भारत के लिए एक चेतावनी है। यह स्पष्ट संकेत है कि जलवायु परिवर्तन, अनियोजित शहरीकरण और पर्यावरणीय क्षरण मिलकर भारतीय शहरों को एक गंभीर ताप संकट की ओर धकेल रहे हैं।
ताप जोखिम का अर्थ केवल बढ़ते तापमान से नहीं है। यह उस समग्र स्थिति को दर्शाता है जिसमें अत्यधिक गर्मी के संपर्क, जनसंख्या की संवेदनशीलता और उससे निपटने की क्षमता का संयुक्त प्रभाव शामिल होता है। ऑक्सफोर्ड अध्ययन के अनुसार हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई और मुंबई जैसे शहर लगातार बढ़ती गर्मी का सामना कर रहे हैं। हैदराबाद में वर्ष 2026 के दौरान 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वाले दिनों की संख्या पिछले दशक में सबसे अधिक दर्ज की गई। यह स्थिति बताती है कि शहरी क्षेत्रों में तापमान वृद्धि की गति राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है।
इस संकट के पीछे सबसे बड़ा कारण अनियोजित शहरीकरण है। शहरों में कंक्रीट और डामर का तेजी से विस्तार, पेड़ों की कटाई, जल निकायों का अतिक्रमण तथा हरित क्षेत्रों में कमी ने “अर्बन हीट आइलैंड” प्रभाव को बढ़ा दिया है। परिणामस्वरूप शहर अपने आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहे हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार भारतीय शहर ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा लगभग 45 प्रतिशत अधिक तेजी से गर्म हो सकते हैं।
ताप संकट का प्रभाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जनस्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के लिए भी गंभीर चुनौती बन चुका है। ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद (CEEW) के अनुसार भारत की 76 प्रतिशत से अधिक आबादी अत्यधिक गर्मी के उच्च या बहुत उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में रहती है। लू और अत्यधिक गर्मी से हीट स्ट्रोक, निर्जलीकरण, हृदय रोग तथा अन्य स्वास्थ्य समस्याओं में वृद्धि हो रही है। दूसरी ओर, निर्माण, कृषि और अन्य श्रम-प्रधान क्षेत्रों में कार्यरत मजदूरों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है, जिससे आर्थिक नुकसान भी बढ़ रहा है। जल संकट और बिजली की बढ़ती मांग इस समस्या को और जटिल बना रहे हैं।
इस चुनौती का समाधान केवल अल्पकालिक उपायों से संभव नहीं है। शहरों में हरित क्षेत्रों का विस्तार, शहरी वनों का विकास, जल निकायों का संरक्षण, ‘कूल रूफ’ जैसी तकनीकों को बढ़ावा और प्रभावी हीट एक्शन प्लान तैयार करना समय की आवश्यकता है। साथ ही, शहरी विकास योजनाओं में ताप जोखिम प्रबंधन को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए।
भारत आज विश्व के सबसे तेजी से शहरीकरण करने वाले देशों में है। यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में ताप संकट हमारे शहरों की रहने योग्य क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। इसलिए अब आवश्यकता ऐसे सतत, समावेशी और जलवायु-अनुकूल शहरी विकास मॉडल की है, जो आर्थिक प्रगति के साथ-साथ नागरिकों के स्वास्थ्य और पर्यावरणीय सुरक्षा को भी सुनिश्चित कर सके। यही भविष्य के सुरक्षित और सशक्त भारत की आधारशिला होगी।


