बिहार के मिथिलांचल की सांस्कृतिक पहचान में सामा चकेवा का विशेष स्थान है। यह पर्व भाई-बहन के स्नेह, लोककला, सामुदायिक एकता और प्रकृति प्रेम का अद्भुत प्रतीक माना जाता है। कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भैया दूज) से शुरू होकर कार्तिक पूर्णिमा तक मनाया जाने वाला यह उत्सव मिथिला की लोक-परंपराओं को जीवंत बना देता है।
लोककथाओं के अनुसार यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण की पुत्री ‘सामा’ और पुत्र ‘चकेवा’ से जुड़ा है। कहा जाता है कि चुगली और झूठे आरोपों के कारण सामा को पक्षी बनने का श्राप मिला था। अपनी बहन को मुक्त कराने के लिए चकेवा ने कठिन तप किया और अंततः उसे पुनः मानव रूप दिलाया। यही कथा इस पर्व को भाई-बहन के अटूट विश्वास और प्रेम का प्रतीक बनाती है।
इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता मिट्टी से बनी रंग-बिरंगी मूर्तियाँ हैं। महिलाएँ और युवतियाँ सामा, चकेवा, चुगला तथा विभिन्न पक्षियों की प्रतिमाएँ बनाकर बाँस की टोकरी में सजाती हैं। संध्या समय समूह में मैथिली लोकगीत गाते हुए सामूहिक रूप से पर्व मनाया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन प्रतिमाओं का विसर्जन कर पर्व का समापन होता है।
सामा-चकेवा पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देता है। यह पर्व प्रवासी पक्षियों के स्वागत और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को दर्शाता है। मिट्टी और प्राकृतिक रंगों का उपयोग हमें पारंपरिक एवं सतत जीवनशैली की याद दिलाता है। आधुनिकता के दौर में भी यह पर्व मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है।


